नैनीताल. उत्तराखंड की समृद्ध लोक परंपराओं में शामिल प्रसिद्ध बाल लोकपर्व फूलदेई इस वर्ष 15 मार्च 2026, रविवार को पूरे उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाएगा. चैत्र मास की प्रथम गते पर मनाया जाने वाला यह पर्व प्रकृति के प्रति आभार और प्रेम प्रकट करने का प्रतीक माना जाता है.खास बात यह है कि यह त्योहार मुख्य रूप से बच्चों द्वारा मनाया जाता है, इसलिए इसे लोक बाल पर्व भी कहा जाता है.
देवभूमि उत्तराखंड में प्रकृति से जुड़ी परंपराओं की लंबी विरासत रही है. चाहे पेड़ों की रक्षा के लिए चला चिपको आंदोलन हो, पौधरोपण से जुड़ा मैती आंदोलन या फिर हरियाली का प्रतीक हरेला पर्व, इसी कड़ी में फूलदेई भी प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और प्रेम व्यक्त करने वाला महत्वपूर्ण त्योहार है. नैनीताल निवासी ज्योतिषाचार्य आचार्य पंडित प्रकाश जोशी के अनुसार यह पर्व हर वर्ष 14 या 15 मार्च को मनाया जाता है और इस बार 15 मार्च को पूरे उत्तराखंड में इसकी धूम देखने को मिलेगी.
बच्चे घर-घर जाकर चढ़ाते हैं फूल
फूलदेई के एक दिन पहले ही बच्चे जंगलों और बाग-बगीचों से प्योली, बुरांश, बासिंग, आड़ू, खुबानी और मेहल जैसे रंग-बिरंगे फूल इकट्ठा करने में जुट जाते हैं. फूलदेई के दिन सुबह स्नान करने के बाद बच्चे रिंगाल की टोकरी में फूल सजाकर घर-घर जाते हैं और लोगों की सुख-समृद्धि के लिए पारंपरिक गीत गाते हुए घर की देहरी पर फूल चढ़ाते हैं. इस दौरान बच्चे प्रसिद्ध लोकगीत गाते हैं,
“फूलदेई छम्मा देई, रेणी द्वार भर भकार…”
इस गीत के माध्यम से घर-परिवार की खुशहाली और भरे-पूरे भंडार की कामना की जाती है. गीत गाने के बदले में लोग बच्चों को दाल, चावल, गुड़, घी और दक्षिणा देते हैं. बाद में इन चावलों को सुखाकर पारंपरिक हाथ से चलने वाली चक्की यानी जतारा में पीसकर उससे “साई” नाम का प्रसाद बनाया जाता है, जिसे पूरे गांव में बांटा जाता है. कुमाऊं और गढ़वाल के कई इलाकों में यह पर्व आठ दिनों तक मनाया जाता है, जबकि टिहरी के कुछ क्षेत्रों में यह उत्सव लगभग एक महीने तक चलता है. आज भले ही समय के साथ जीवनशैली बदल गई हो, लेकिन उत्तराखंड के गांवों और पहाड़ी क्षेत्रों में यह परंपरा आज भी जीवित है. बच्चों की टोलियां और घर-घर सजी देहरियां इस पर्व को खास बनाती हैं. लोक संस्कृति को जीवित रखने के लिए समाज के हर वर्ग को इस पारंपरिक त्योहार को और अधिक उत्साह के साथ मनाने की जरूरत है.