नैनीताल. पितृपक्ष को सनातन परंपरा में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और उनके स्मरण का समय माना जाता है. श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान से जुड़ी ऐसी ही एक रोचक कथा महाभारत के आदि पर्व में मिलती है. यह कथा जरत्कारु ऋषि और उनके पितरों की है, जिसमें पितृ ऋण से मुक्ति और वंश परंपरा के महत्व को बताया गया है.
नैनीताल निवासी ज्योतिषाचार्य पंडित प्रकाश जोशी के अनुसार, जरत्कारु ऋषि ब्रह्मचारी जीवन बिताते हुए वन में तपस्या कर रहे थे. एक दिन उन्हें गड्ढे के ऊपर कुशा के तिनके के सहारे कुछ पितृगण उल्टे लटके दिखाई दिए. कुशा को एक चूहा धीरे-धीरे काट रहा था. ऋषि ने पितरों से उनकी स्थिति का कारण पूछा.
जरत्कारु को देख सामने आया पितृ ऋण का रहस्य
पितरों ने बताया कि उनके वंश में कोई संतान नहीं बची है, जो पितृपक्ष में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान कर उन्हें मुक्ति दिला सके. उन्होंने बताया कि वंश में केवल जरत्कारु नाम का एक व्यक्ति बचा है, जो विवाह न करके ब्रह्मचर्य जीवन व्यतीत कर रहा है. पितरों ने कुशा को जरत्कारु और चूहे को काल यानी समय का प्रतीक बताया. उनका कहना था कि समय बीतने के साथ कुशा कट जाएगी और वे गड्ढे में गिर जाएंगे. यह सुनकर ऋषि को पता चला कि वे पितर उन्हीं के पूर्वज हैं.
तीन शर्तों पर हुआ विवाह
पितरों की मुक्ति के लिए जरत्कारु ऋषि ने विवाह करने का निर्णय लिया. उन्होंने विवाह के लिए तीन शर्तें रखीं कन्या का नाम भी जरत्कारु हो, उसका विवाह उन्हें भिक्षा स्वरूप मिले और यदि वह कभी उनकी बात का उल्लंघन करे तो वे उसे छोड़ सकें. कथा के अनुसार नागराज वासुकी ने इन शर्तों को स्वीकार किया और अपनी बहन जरत्कारु का विवाह ऋषि से कराया. उनके पुत्र के रूप में आस्तिक मुनि का जन्म हुआ. मान्यता है कि आस्तिक के जन्म के बाद जरत्कारु के पितरों को उस संकट से मुक्ति मिली और उन्हें उत्तम लोक की प्राप्ति हुई. पंडित प्रकाश जोशी बताते हैं कि यह प्रसंग केवल विवाह या वंश वृद्धि की कथा नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति कर्तव्य और पितृ ऋण की अवधारणा को भी सामने रखता है. कथा में संदेश दिया गया है कि अपने कुल और पूर्वजों के प्रति कर्तव्यों का निर्वहन भी धर्म का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है.






