पितरों को प्रसन्न करने का दिन! 4 अक्टूबर को अन्वष्टका श्राद्ध, जानिए क्या कहता है शास्त्र

नैनीताल. पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म का विशेष महत्व माना गया है. इसी क्रम में महालय पक्ष की नवमी तिथि को अन्वष्टका श्राद्ध किया जाता है. इस वर्ष अन्वष्टका श्राद्ध 4 अक्टूबर 2026, रविवार को मनाया जाएगा. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से पितरों का स्मरण एवं तर्पण करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है. उत्तराखंड के नैनीताल निवासी ज्योतिषाचार्य पंडित प्रकाश जोशी बताते हैं कि विभिन्न पुराणों और शास्त्रों में श्राद्ध कर्म के महत्व का विस्तार से वर्णन मिलता है. मार्कण्डेय पुराण के अनुसार श्राद्ध से संतुष्ट होकर पितृगण श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को दीर्घायु, संतान, धन, विद्या, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं. वहीं कर्म पुराण में श्रद्धा और एकाग्रता के साथ किए गए श्राद्ध को पापों से मुक्ति का माध्यम बताया गया है.

 

उन्होंने बताया कि श्राद्ध कर्म में केवल बड़े स्तर पर आयोजन ही महत्वपूर्ण नहीं माना गया है, बल्कि श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया छोटा-सा तर्पण भी पितरों के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जाता है. ब्रह्म पुराण में भी श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध और तर्पण से पितरों की तृप्ति का उल्लेख मिलता है. शास्त्रों में पितरों को पितृ देव कहा गया है. हिंदू परंपरा में किसी भी शुभ कार्य से पहले पितरों का स्मरण करने की परंपरा भी रही है, जिसे नांदी श्राद्ध या आब्दिक श्राद्ध से जोड़ा जाता है.

 

दक्षिण दिशा की ओर मुख करके श्राद्ध की परंपरा

 

पंडित प्रकाश जोशी के अनुसार, तैत्तिरीय संहिता में वर्णित परंपरा के अनुसार पितरों के श्राद्ध और तर्पण के समय दक्षिण दिशा की ओर मुख करने तथा जनेऊ को दाएं कंधे पर धारण करने की विधि बताई गई है. धार्मिक मान्यता में दक्षिण दिशा को पितरों से संबंधित माना गया है. श्राद्ध कर्म में गंगाजल, दूध, शहद, वस्त्र, दौहित्र, कुश और तिल को महत्वपूर्ण माना गया है. तुलसी का प्रयोग भी पितृ कर्म में विशेष धार्मिक महत्व रखता है.

 

कर्ण से जुड़ी है पितृपक्ष की कथा

 

पितृपक्ष से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा महाभारत के कर्ण से संबंधित है. मान्यता के अनुसार मृत्यु के बाद जब कर्ण स्वर्ग पहुंचे तो उन्हें भोजन के स्थान पर सोना और आभूषण प्राप्त हुए. कारण पूछने पर इंद्रदेव ने बताया कि कर्ण ने जीवन में खूब धन और आभूषण दान किए, लेकिन अपने पूर्वजों के लिए अन्न का दान नहीं किया था. कर्ण ने बताया कि उन्हें अपने पूर्वजों के बारे में जानकारी नहीं थी. इसके बाद उन्हें कुछ समय के लिए पृथ्वी पर लौटकर अपने पूर्वजों के लिए अन्न और जल का दान करने की अनुमति मिली. धार्मिक कथा में इसी अवधि को पितृपक्ष और श्राद्ध परंपरा से जोड़ा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अन्वष्टका श्राद्ध अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर माना जाता है.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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