Nainital News: पहाड़ों में क्यों बढ़ रहे हैं गुलदार के हमले? पलायन और ‘घोस्ट विलेज’ बन रहे बड़ी वजह

नैनीताल. उत्तराखंड समेत पूरे पर्वतीय क्षेत्रों में गुलदार के हमलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. बीते कुछ वर्षों में इन घटनाओं ने ग्रामीण इलाकों में डर का माहौल पैदा कर दिया है. खासकर नैनीताल और आसपास के क्षेत्रों में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं तेजी से सामने आ रही हैं. विशेषज्ञों और वन विभाग का मानना है कि इसके पीछे पहाड़ों से हो रहा पलायन और तेजी से बढ़ते ‘घोस्ट विलेज’ सबसे बड़ी वजह बनते जा रहे हैं.

दरअसल, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के चलते बड़ी संख्या में लोग पहाड़ों से मैदानी क्षेत्रों की ओर पलायन कर चुके हैं. इसके परिणामस्वरूप कई गांव या तो पूरी तरह खाली हो गए हैं या वहां बहुत कम आबादी रह गई है. ऐसे गांवों को अब ‘घोस्ट विलेज’ कहा जा रहा है. जब गांव खाली होते हैं तो खेत-खलिहान, आंगन और घरों के आसपास की जमीन धीरे-धीरे झाड़ियों और जंगल में तब्दील हो जाती है. यही घनी झाड़ियां गुलदार जैसे शिकारी जानवरों के लिए सुरक्षित ठिकाना बन जाती हैं.

इस वजह से बढ़ रहे हैं गुलदार के हमले

नैनीताल वन प्रभाग के डीएफओ आकाश गंगवार बताते हैं कि जिले के अधिकांश गांव जंगलों से सटे हुए हैं. ऐसे इलाकों में महिलाएं और बुजुर्ग रोजमर्रा की जरूरतों के लिए चारा और लकड़ी लेने जंगल जाते हैं, जहां गुलदार के हमले का खतरा अधिक रहता है. विशेष रूप से सुबह और शाम के समय गुलदार की गतिविधियां बढ़ जाती हैं. जंगलों में प्राकृतिक शिकार की कमी और इंसानी आवाजाही कम होने से गुलदार अब बस्तियों के आसपास ही रहने लगा है. मवेशी, पालतू जानवर और कभी-कभी इंसान भी उसके आसान शिकार बन रहे हैं.

वनविभाग द्वारा चलाया जा रहा है जागरूकता अभियान

डीएफओ आकाश गंगवार के अनुसार गुलदार बेहद अनुकूलनशील और चालाक जानवर है. घोस्ट विलेज में उगी झाड़ियां उसे छिपने और अचानक हमला करने में मदद करती हैं. इस चुनौती से निपटने के लिए वन विभाग द्वारा लगातार जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं. ग्रामीणों को वीडियो, कैलेंडर और बैठकों के माध्यम से सावधान किया जा रहा है कि वे अकेले जंगल न जाएं, रात के समय बाहर निकलने से बचें और रोशनी के साथ ही आवाजाही करें.

इस वजह से बढ़ते हैं सर्दियों में हमले

विशेषज्ञ बताते हैं कि सर्दियों का मौसम गुलदार और बाघों के लिए संवेदनशील होता है, क्योंकि इस दौरान उनका ‘मीटिंग सीजन’ रहता है और वे अधिक आक्रामक हो सकते हैं. साथ ही उत्तराखंड के जंगलों में बाघों की बढ़ती संख्या के कारण उनके और गुलदार के इलाकों के टकराव से संघर्ष और बढ़ रहा है. जानकारों का मानना है कि यदि पहाड़ों से पलायन की समस्या पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया और गांवों में रोजगार व बुनियादी सुविधाएं मजबूत नहीं की गईं, तो भविष्य में गुलदार के हमलों की घटनाएं और गंभीर रूप ले सकती हैं.

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