नैनीताल. उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में आज 17 सितंबर को खतड़वा लोकपर्व मनाया जाएगा. यह पर्व मुख्य रूप से पशुधन के स्वास्थ्य, उनकी देखभाल और ऋतु परिवर्तन से जुड़ी लोकपरंपराओं के लिए जाना जाता है. ज्योतिषाचार्य पंडित प्रकाश जोशी के अनुसार, खतड़वा को लेकर समाज में प्रचलित कुछ धारणाओं से अलग इसे मूल रूप से पशुधन पर्व के रूप में देखा जाता है.
‘खतड़वा’ शब्द को ‘खातड़ि’ से जोड़ा जाता है, जिसका अर्थ जानवरों का बिस्तर माना जाता है. इस दिन गोठ यानी गौशाला की साफ-सफाई की जाती है. पशुओं को नहलाने के साथ उनके बैठने की जगह पर सूखी घास-फूस बिछाई जाती है, ताकि बारिश के बाद होने वाली बीमारियों और ठंड से उन्हें बचाया जा सके.
खतड़वा जलाने की परम्परा
यह पर्व पर पशुओं को हरी घास और पौष्टिक आहार खिलाने की परंपरा भी है. शाम के समय चीड़ की ज्वलनशील लकड़ी यानी छिलके की मशाल जलाकर घर और गोठ के आसपास घुमाई जाती है. इसके बाद चौराहे पर बनाए गए खतड़वा के पुतले को जलाया जाता है. लोकमान्यता में खतड़वा को पशुओं के रोगों का प्रतीक माना जाता है. इस दौरान ‘भाग खतड़वा भाग’ और ‘गाय की जीत, खतड़वा की हार’ जैसे पारंपरिक नारे लगाए जाते हैं. इस दिन पहाड़ी हरी ककड़ी का प्रसाद बनाए जाने की परंपरा भी बताई जाती है. यह पर्व कन्या संक्रांति से भी जुड़ा है, क्योंकि इसी समय सूर्य के सिंह राशि से कन्या राशि में प्रवेश करने की मान्यता है. पंडित प्रकाश जोशी के अनुसार, खतड़वा को गढ़वाल और कुमाऊं के राजाओं के बीच युद्ध से जोड़ने वाली कहानी को ऐतिहासिक तथ्य नहीं, बल्कि एक भ्रांति माना जाना चाहिए.






