नैनीताल वाले नहीं पीते नैनीझील का पानी, जानिए नलों तक पहुंचने की पूरी साइंटिफिक यात्रा

नैनीताल. उत्तराखंड की सरोवर नगरी नैनीताल की पहचान उसकी खूबसूरत नैनीझील से है, झील के किनारे घूमते हुए लगभग हर पर्यटक के मन में एक ही सवाल आता है, क्या यहां के लोग उसी झील का पानी पीते हैं जो शहर के बीचों-बीच चमकती दिखाई देती है? लेकिन हकीकत इस लोकप्रिय धारणा से बिल्कुल अलग है.

 

जल संस्थान के अधिकारियों के अनुसार नैनीताल के घरों तक सीधे झील का पानी नहीं पहुंचाया जाता बल्कि शहर की पेयजल व्यवस्था एक वैज्ञानिक और व्यवस्थित प्रक्रिया पर आधारित है. यहां पीने के लिए मुख्य रूप से भूमिगत जल (ग्राउंड वाटर) का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे झील के आसपास बने गहरे बोरवेल और ट्यूबवेल से निकाला जाता है. शक्तिशाली पंपों की मदद से पानी को जमीन के अंदर मौजूद प्राकृतिक स्रोतों से खींचकर बड़े स्टोरेज टैंकों तक पहुंचाया जाता है.

 

इस तरह पहुंचता है घरों तक पानी

बोरवेल से निकालने के बाद पानी को ट्रीटमेंट प्लांट में भेजा जाता है, जहां उसकी गुणवत्ता की जांच होती है. जल संस्थान के कैमिस्ट योगेंद्र पाल बताते हैं कि शुद्धिकरण प्रक्रिया में सबसे अहम चरण क्लोरीनेशन है. निर्धारित वैज्ञानिक मानकों के अनुसार पानी में क्लोरीन मिलाया जाता है ताकि बैक्टीरिया और सूक्ष्मजीव नष्ट हो सकें. फिल्टरिंग और दोबारा परीक्षण के बाद ही पानी सप्लाई के लिए तैयार माना जाता है. शुद्ध पानी को शहर के ऊंचाई वाले इलाकों में बने जलाशयों और ओवरहेड टैंकों में जमा किया जाता है. पहाड़ी शहर होने के कारण नैनीताल में पानी गुरुत्वाकर्षण प्रणाली के जरिए पाइपलाइनों से घर-घर पहुंचता है. इसी वजह से कई मोहल्लों में तय समय पर ही पानी की सप्लाई की जाती है, ताकि सभी क्षेत्रों तक समान वितरण हो सके. हालांकि झील का पानी सीधे पीने योग्य नहीं होता, क्योंकि उसमें मिट्टी के कण, जैविक तत्व और बाहरी प्रदूषण शामिल हो सकते हैं. नैनीझील शहर के पर्यावरण, पर्यटन और मौसम संतुलन के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन पेयजल आपूर्ति के लिए अलग स्रोत रखना ही शहरवासियों के लिए सुरक्षित विकल्प है.

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