Kainchi Dham: कौन हैं संत सोमवारी बाबा? जिनका कैंची धाम से है खास संबंध

स्थानीय मान्यताओं और इतिहासकारों के अनुसार सोमवारी बाबा अत्यंत तपस्वी और मौन साधना में लीन रहने वाले सिद्ध महात्मा थे. कहा जाता है कि वे सप्ताह में केवल सोमवार के दिन ही बोलते थे, इसी कारण उन्हें ‘सोमवारी बाबा’ कहा गया.

by Unfiltered Uttarakhand Desk
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नैनीताल. उत्तराखंड के नैनीताल जिले में स्थित विश्वविख्यात कैंची धाम को आज बाबा नीम करौली महाराज के कारण वैश्विक पहचान मिली है. हर साल देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि नीम करौली बाबा से पहले भी इस पावन भूमि पर एक महान सिद्ध संत ने वर्षों तक कठोर तपस्या की थी, जिन्हें सोमवारी बाबा या सोमवारी महाराज के नाम से जाना जाता है. आज भी कैंची धाम परिसर में स्थित उनकी गुफा उनकी गहन साधना की मौन साक्षी बनी हुई है.

स्थानीय मान्यताओं और इतिहासकारों के अनुसार सोमवारी बाबा अत्यंत तपस्वी और मौन साधना में लीन रहने वाले सिद्ध महात्मा थे. कहा जाता है कि वे सप्ताह में केवल सोमवार के दिन ही बोलते थे, इसी कारण उन्हें ‘सोमवारी बाबा’ कहा गया. उन्होंने अपना अधिकांश जीवन जंगलों, पर्वतों और गुफाओं में साधना करते हुए बिताया. उनके तप से प्रभावित होकर दूर-दूर से साधक और श्रद्धालु उनके दर्शन के लिए आते थे.

एक घटना ने बदल दी जीवन की दिशा

उत्तराखंड के प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. अजय रावत बताते हैं कि सोमवारी महाराज का जन्म वर्ष 1860 में पंजाब में हुआ था. उनके पिता वहां जज थे और प्रारंभिक शिक्षा भी पंजाब में ही हुई. युवावस्था में उन्होंने पुलिस सेवा जॉइन की और एक ईमानदार व कुशल अधिकारी के रूप में कार्य किया. हालांकि उनका मन सदैव अध्यात्म की ओर आकर्षित रहता था. एक अद्भुत घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी. एक बार वे एक स्वामी के दर्शन के लिए गए थे, उसी दौरान उनके थाने का औचक निरीक्षण हुआ. सभी पुलिसकर्मियों के अनुपस्थित होने के बावजूद सोमवारी महाराज के बारे में उच्च अधिकारियों ने कहा कि उन्होंने निरीक्षण में सभी प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर दिए. इसे दैवी कृपा मानकर उन्होंने वैराग्य धारण कर लिया और सांसारिक जीवन त्याग दिया.

कैंची धाम में स्थित है सोमवारी बाबा की गुफा

हिमालय की ओर प्रस्थान कर वे पदमपुरी पहुंचे, जहां उन्होंने कठोर तपस्या की. अत्यधिक ठंड में पदमपुरी और भीषण गर्मी में काकड़ीघाट में साधना करना उनकी दिनचर्या थी. पदमपुरी और काकड़ीघाट में उनके आश्रम स्थापित हुए, जहां हर सोमवार भंडारे का आयोजन होता था. मान्यता है कि जिन गुफाओं और स्थलों पर सोमवारी बाबा ने तप किया, वहीं बाद में बाबा नीम करौली महाराज ने मंदिरों की स्थापना की. नीम करौली बाबा उनकी साधना से अत्यंत प्रभावित थे. आज भी कैंची धाम में सोमवारी बाबा की गुफा श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था का केंद्र है. वर्तमान में उत्तराखंड सरकार मानस खंड मंदिर मिशन के तहत पदमपुरी स्थित उनके आश्रम का सौंदर्यीकरण कर रही है, जिससे यह ऐतिहासिक और आध्यात्मिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रह सके.

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