नैनीताल. तिब्बती आध्यात्मिक परंपरा और बौद्ध संस्कृति के लिए यह पल ऐतिहासिक बन गया, जब तिब्बती धर्मगुरु को प्रतिष्ठित ग्रैमी अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। यह सम्मान केवल संगीत तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे करुणा, ध्यान, शांति और मानवता के वैश्विक संदेश की स्वीकृति के रूप में देखा जा रहा है. इस उपलब्धि से उत्तराखंड की सरोवर नगरी नैनीताल भी भावनात्मक रूप से जुड़ गई है, जहां परम पावन दलाई लामा की स्मृतियां आज भी तिब्बती और भोटिया समुदाय के दिलों में जीवित हैं.
नैनीताल तिब्बती समुदाय के अध्यक्ष याशी थूपतेन बताते हैं कि वर्ष 2003 में दलाई लामा तीन दिवसीय प्रवास पर नैनीताल आए थे और राजभवन में ठहरे थे. इस दौरान उन्होंने बौद्ध मठ में धार्मिक अनुष्ठान कराए और बलरामपुर हाउस में जनसंपर्क कार्यक्रम के जरिए स्थानीय लोगों से संवाद किया. उनके संदेश का मूल भाव सभी धर्मों के सह-अस्तित्व, आपसी सम्मान और शांति के साथ जीवन जीने का था. याशी थूपतेन बताते हैं कि दलाई लामा से मुलाकात उनके जीवन की सबसे यादगार घटना रही. उन्होंने कहा कि उनके व्यक्तित्व से सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है और उनकी उपस्थिति ही लोगों को प्रेम व अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है.
भोटिया समुदाय में भी खुशी का माहौल
नैनीताल निवासी भोटिया समुदाय से जुड़े प्रेम सिंह भोटिया ने भी इस सम्मान को पूरे भारत के लिए गर्व का विषय बताया. उनका कहना है कि बौद्ध धर्म सदैव दया, करुणा और समानता का संदेश देता आया है और यही शिक्षा दलाई लामा ने नैनीताल प्रवास के दौरान भी दी थी. उन्होंने यह भी बताया कि पहले यहां करीब 42-43 बौद्ध परिवार रहते थे, जो अब लगभग 38 रह गए हैं, लेकिन समुदाय अपनी संस्कृति और परंपराओं को आज भी सहेज कर आगे बढ़ा रहा है. ग्रैमी अवॉर्ड मिलने के बाद दुनियाभर में बसे तिब्बती समुदाय के लोग सोशल मीडिया पर बधाई संदेश साझा कर रहे हैं. नैनीताल में भी इस उपलब्धि को गर्व और भावुकता के साथ याद किया जा रहा है. स्थानीय लोगों का मानना है कि यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि शांति, प्रेम और सह-अस्तित्व की उस विचारधारा का है, जिसकी सीख दलाई लामा वर्षों से दुनिया को देते आए हैं.