नैनीताल. उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों से वर्षों से जारी पलायन अब धीरे-धीरे थमने लगा है. रोजगार और बेहतर भविष्य की तलाश में शहरों की ओर जाने को मजबूर युवा अब अपने गांवों में ही संभावनाएं तलाश रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह राज्य सरकार और पर्यटन विभाग की वे योजनाएं हैं, जिन्होंने पहाड़ों में स्वरोजगार के नए रास्ते खोले हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है.
कभी “घोस्ट विलेज” कहलाने वाले कई गांव अब दोबारा आबाद होने लगे हैं. पर्यटन विभाग द्वारा पहाड़ी क्षेत्रों में होमस्टे संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है. पारंपरिक पहाड़ी घरों को संवारकर होमस्टे में बदला जा रहा है, जिससे स्थानीय परिवारों को सीधा आर्थिक लाभ मिल रहा है. पर्यटक भी गांवों में रहकर उत्तराखंड की संस्कृति, खान-पान और जीवनशैली को करीब से अनुभव कर रहे हैं.
इस तरह पर्यटन को बढ़ावा दे रहा विभाग
पर्यटन विभाग युवाओं को बर्ड वॉचिंग, एस्ट्रोनॉमी, ट्रैकिंग, नेचर गाइड और एडवेंचर टूरिज्म जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण दे रहा है. इससे युवा अब नौकरी की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने के बजाय अपने गांव में ही स्वरोजगार शुरू कर रहे हैं. नैनीताल जिला इस बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल बनकर उभरा है. जिला पर्यटन अधिकारी अतुल भंडारी के अनुसार जिले में इस समय 909 पंजीकृत होमस्टे संचालित हो रहे हैं. इसके अलावा 995 होटल, रिसॉर्ट और टेंट कॉलोनियां भी पर्यटन को गति दे रही हैं. बीते पांच वर्षों में 660 नई पर्यटन इकाइयों की स्थापना हुई है, जिससे सैकड़ों युवाओं को रोजगार मिला है. पर्यटन आधारित व्यवसायों को बढ़ावा देने के लिए सरकार दो प्रमुख योजनाएं चला रही है. वीर चंद्र सिंह गढ़वाली पर्यटन स्वरोजगार योजना के तहत होमस्टे, कैफे, रेस्टोरेंट और एडवेंचर टूरिज्म से जुड़े कार्यों पर 33 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जा रही है. वहीं पंडित दीनदयाल उपाध्याय होमस्टे विकास योजना के तहत 15 लाख रुपये तक का ऋण मिलता है, जिसमें 50 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाती है. ये योजनाएं न सिर्फ पलायन पर प्रभावी रोक लगा रही हैं, बल्कि पहाड़ों की अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बना रही हैं. गांवों की ओर लौटते युवा और बढ़ता पर्यटन उत्तराखंड के उज्ज्वल भविष्य की मजबूत नींव बनते नजर आ रहे हैं.