नैनीताल. उत्तराखंड की सरोवर नगरी नैनीताल में मौसम बदलने के साथ आसमान में एक नन्हा मेहमान फिर लौट आया है. झील के ऊपर तेज़ी से मंडराती और पुराने मकानों-पेड़ों के आसपास चहचहाती दिखाई देने वाली यह चिड़िया है अबाबील (Swallow). पहाड़ों में इसे वसंत ऋतु का प्राकृतिक संदेशवाहक माना जाता है. फरवरी के अंतिम दिनों से मार्च की शुरुआत तक इसके दिखाई देते ही लोग समझ जाते हैं कि अब कड़ाके की ठंड विदा लेने वाली है और सुहावने मौसम की दस्तक हो चुकी है.
स्थानीय लोगों और पर्यटकों का ध्यान इन दिनों झील क्षेत्र में उड़ते अबाबीलों के झुंड अपनी ओर खींच रहे हैं. पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार अबाबील एक प्रवासी पक्षी है, जो सर्दियों के दौरान अफ्रीका के गर्म क्षेत्रों, विशेषकर दक्षिण अफ्रीका में समय बिताने के बाद हर साल हजारों किलोमीटर की यात्रा तय कर हिमालयी क्षेत्रों में लौटती है. मौसम वैज्ञानिक भी इसे तापमान बढ़ने और वसंत की शुरुआत का प्राकृतिक संकेत मानते हैं.
अबाबील लेकर आई शुभ संकेत
बर्ड वॉचर जगजीवन सिंह धामी बताते हैं कि अबाबील दरअसल स्वैलो और मार्टिन समूह की चिड़ियों के लिए प्रयोग होने वाला शब्द है. यह हवा में उड़ते हुए ही कीड़े-मकोड़े पकड़कर भोजन करती है और इंसानी बस्तियों के पास रहना पसंद करती है. नैनीताल में पुराने घरों, दुकानों और होटलों की दीवारों के ऊपरी हिस्सों में इसके मिट्टी से बने घोंसले आसानी से देखे जा सकते हैं. धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं में भी इस पक्षी का खास महत्व है. स्थानीय लोगों का मानना है कि घर के आसपास अबाबील का घोंसला बनना शुभ संकेत होता है और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. कई परिवार इन घोंसलों को हटाने के बजाय सुरक्षित रखते हैं.
इस वजह से घट रही संख्या
जगजीवन इसकी घटती संख्या को लेकर चिंता भी जता रहे हैं. कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग से कीड़े-मकोड़ों की संख्या कम हो रही है, जो इस पक्षी का मुख्य भोजन है. जगजीवन सिंह धामी का कहना है कि यदि प्राकृतिक पारिस्थितिकी की रक्षा की जाए और रसायनों का उपयोग कम हो, तो इन प्रवासी पक्षियों की वापसी लंबे समय तक बनी रह सकती है. अबाबील की चहचहाहट केवल मौसम नहीं बदलती, बल्कि प्रकृति संरक्षण का संदेश भी देती है.