नैनीताल. देवभूमि उत्तराखंड सिर्फ अपनी बर्फीली चोटियों, हरे-भरे जंगलों और शांत झीलों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी गहरी धार्मिक आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं के लिए भी जाना जाता है. यहां की संस्कृति में कुलदेवी और कुलदेवता की मान्यता आज भी उतनी ही जीवंत है, जितनी पीढ़ियों पहले थी. पहाड़ों में यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं, बल्कि परिवार, वंश और सामाजिक पहचान से भी गहराई से जुड़ी हुई है.
उत्तराखंड के लगभग हर परिवार का अपना एक कुलदेवता या कुलदेवी होता है, जिन्हें वंश का रक्षक माना जाता है. मान्यता है कि कुलदेवता परिवार को संकटों से बचाते हैं और सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य व शांति का आशीर्वाद प्रदान करते हैं. यही वजह है कि विवाह, संतान जन्म, नामकरण, नई बहू का गृह प्रवेश या किसी भी शुभ कार्य से पहले सबसे पहले कुलदेवता को आमंत्रण दिया जाता है.
हर गांव में होता है कुल देवता का मंदिर
राज्य के अधिकांश गांवों में आज भी कुलदेवता के प्राचीन मंदिर मौजूद हैं, जहां पीढ़ियों से पूजा-अर्चना की जा रही है. शादी से पहले वर-वधू पक्ष कुलदेवता के मंदिर में दीप प्रज्ज्वलित कर विवाह का निमंत्रण पत्र अर्पित करते हैं और मंगल कामना करते हैं. संतान जन्म के बाद तय अवधि में मंदिर जाकर आशीर्वाद लेना भी अनिवार्य माना जाता है.
हर कुल का होता है अपना इष्ट
नैनीताल निवासी पंडित प्रकाश जोशी बताते हैं कि कुलदेवी-कुलदेवता की परंपरा हिंदू धर्म की अत्यंत प्राचीन मान्यताओं में से एक है. हर कुल का अपना इष्ट देव होता है, जो उस वंश की रक्षा और उन्नति करता है. पहाड़ों में किसी के कुलदेवता पांडव माने जाते हैं, तो किसी के गोलू देवता, सैम देवता या कत्यूरी देव. आधुनिकता और शहरों की ओर पलायन के बावजूद पहाड़ों में यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है. यह परंपरा उत्तराखंड की सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत बनाए हुए है और आने वाली पीढ़ियों को अपनी आस्था से जोड़ने का कार्य कर रही है.