नैनीताल. माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला बसंत पंचमी का पर्व भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व रखता है. शास्त्रों में इस तिथि को वर्ष की सबसे शुभ तिथियों में शामिल किया गया है. मान्यता है कि इस दिन ज्ञान की देवी मां सरस्वती की विधिवत पूजा-अर्चना करने से विद्या, बुद्धि और विवेक का विकास होता है. यही कारण है कि बसंत पंचमी विद्यार्थियों, शिक्षकों और ज्ञान से जुड़े लोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है.
बसंत पंचमी को विद्यारंभ संस्कार, उपनयन संस्कार और विवाह जैसे मांगलिक कार्यों के लिए भी श्रेष्ठ माना जाता है. परंपरा के अनुसार इसी दिन छोटे बच्चों को पहली बार अक्षर ज्ञान कराया जाता है. पहाड़ी क्षेत्रों में यह पर्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि प्रकृति और ऋतु परिवर्तन से जुड़ा उत्सव भी है.
मौसम में होने लगता है बदलाव
नैनीताल स्थित डीएसबी कॉलेज के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. ललित तिवारी बताते हैं कि बसंत पंचमी को ऋतुराज बसंत का प्रतीकात्मक आगमन माना जाता है. इस दिन के बाद मौसम में बदलाव शुरू हो जाता है. कड़ाके की ठंड धीरे-धीरे कम होने लगती है और वातावरण में नई ऊर्जा का संचार महसूस किया जाता है. पेड़ों में नई पत्तियां आने लगती हैं, फूलों पर भौंरों की गूंज सुनाई देती है और खेतों में सरसों के पीले फूल खिल उठते हैं. यह प्रकृति में नवजीवन का संकेत है. बसंत पंचमी का सबसे प्रमुख रंग पीला माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पीला रंग मां सरस्वती को प्रिय है और यह ज्ञान, समृद्धि व शुभता का प्रतीक है. इसी कारण इस दिन पीले वस्त्र पहनने और पूजा में पीले फूल व पकवानों का प्रयोग किया जाता है.
पीला रंग देता है मानसिक शांति
वैज्ञानिक दृष्टि से भी पीले रंग का महत्व बताया गया है. प्रोफेसर तिवारी के अनुसार पीला रंग मस्तिष्क को शांति देता है और शरीर में खुशी से जुड़े हार्मोन को सक्रिय करता है, जिससे तनाव और अवसाद में कमी आती है. उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में बसंत पंचमी पारंपरिक उल्लास के साथ मनाई जाती है. घरों में विशेष पकवान बनते हैं, मां शारदा की पूजा होती है और इसी दिन से खड़ी होली भी नए रंग में ढलने लगती है. बसंत पंचमी ऐसा पर्व है, जो धर्म, प्रकृति और विज्ञान का सुंदर संगम प्रस्तुत करता है.